सोमवार, 16 जनवरी 2017

विमुद्रीकरण



                         

रुपया 
जो कागज़ हो गया 
कागज़ हो गया 
जीवन 
गीला हो रहा है 
जो गीले हो रहे हैं 
नयन।  

सुना है 
रुपया होता है 
कुछ सफ़ेद 
और कुछ काला 
काला रुपया होता है 
गोरे चमचमाते लोगों के पास 
फैक्ट्री की चिमनियों 
बड़ी बड़ी गाड़ियों में 
और सफ़ेद रुपया 
बंधा होता है 
मैली पसीने से गंधाती 
धोती, साडी की अँटियों में।  

उम्मीद और जोश 
भरा है आँखों में 
जब सारा काला रुपया 
सफ़ेद होकर रहेगा 
मैली पसीने से गंधाती 
धोती और साड़ियों की अँटियों में 
अन्यथा विमुद्रीकरण भी 
सरकार की तमाम अन्य नीतियों की भांति 
बनकर रह जायेगा 
एक छद्म।  

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

भोपाल


भोपाल

शहर के बनने और बसने के बीच
उजड़ता है बहुत कुछ
कुछ मंदिर
कुछ मस्जिद
कुछ महल और
कुछ मजारे
बची रहती हैं
है बार उजड़ने से पहले

न मालूम सदियों पहले
जिसे राजा भोज ने
बसाया था
कौन रहा होगा
इस नगर भोपाल की
भीमवेटिका की गुफाओं में

और जब नवावो ने
बनाये होंगे हवेलियाँ
कितने ही हाथों के ज़ख्म
दफन होंगी इनमे

शहर तमाम दुखों के बाद भी
रहता है ज़िंडा
जैसे ज़िंदा है आज भोपाल
उस गैस रिसाव हादसे के बाद

कौन देख रहा है आज
रिसते हुए औरतों को
खांसते हुए आदमियों को
जली हुई चमड़ी लेकर पैदा हुए बच्चों को
कौन पढ़ रहा है
न्यायालयों की याचिकाओं में दर्ज़
मुर्दा नामों को

खड़े हैं फन उठाये
आज भी अवशेष
रिस रिस धरती की कोख में
भर रहे हैं विष
तिल तिल रोज़
न्यायलय की बंद मिसाइलों के खुलने की
प्रतीक्षा में
और मर रहे हैं मरे हुए लोग
हादसे की टीस को कम नहीं
नहीं होने देते वर्षी पर छपने वाली रिपोर्टें

भोपाल आज भी ज़िंदा है
ज़िंदा हैं वे हज़ारों शव
रिसते हुए  ।

( आज भोपाल गैस हादसे को 27 साल हो गए हैं। बीस हजार से अधिक मौतें हुई थी। आज भी हज़ारों टन दूषित मालवा पड़ा है हादसे स्थल पर और लोगों को बीमार कर रहा है।  इसको हटाने का मामला भी कोर्ट में धक्के खा रहा है। शहर फिर भी ज़िंदा है।  श्रद्धांजलि स्वरुप मेरी एक कविता। )

बुधवार, 2 नवंबर 2016

कौशल विकास योजना : रोज़गार के लिए तैयार होते युवा


कौशल विकास योजना : रोज़गार के लिए तैयार होते युवा 

अरुण चंद्र रॉय 


प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) को लागू किये 31 मार्च 2016 को दो वर्ष पूरा हो गया। एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद शुरू की गई नयी नीतियों में यह एक महत्वपूर्ण नीति है।  देश में युवाओं के कौशल विकास के लिए यह नीति तैयार की गई है ताकि पूरे देश में सभी तरह के कौशल प्रशिक्षण के प्रयासों में निरंतरता, सामंजस्य और समन्वय स्थापित किया जा सके। इस नीति के लागू करने का उद्देश्य कौशल विकास में मुख्य बाधाओं को दूर करना, कुशल कार्मिको की आपूर्ति एवं अंतर को पाटने के लिए कुशलता की मांग को पूरा करना, सामाजिक/भौगोलिक रूप से वंचित एवं कमजोर समुदाय के लोगों को न्यायसंगत तरीके से अवसर मुहैया कराना और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए महिलाओं के लिए कौशल विकास एवं उद्यमिता के कार्यक्रम को रेखांकित करना।  
 
कौशल के पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से जीवंत करने  और दुनियाभर में स्किल्ड वर्क फ़ोर्स का रिसोर्स सेंटर बनाने की दिशा में सरकार कौशल विकास और उद्यमिता 2015 नाम से यह स्कीम लेकर आई है।  गत दो वर्षों में इस स्कीम का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है।  राष्ट्रीय कौशल विकास निगम द्वारा निजी तौर पर कौशल प्रशिक्षण वातावरण तैयार किया गया और  साझेदारों ने पिछले दो वर्षों में 60,78,999 को प्रशिक्षित किया और तकरीबन 19,273,48 लोगों को रोजगार दिलाया। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम ने अब तक 80.33 लाख छात्रों को प्रशिक्षित किया। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम ने अपनी मुहिम में 138 ट्रेनिंग साझेदारों को जोड़ा है।  देशभर में 267 प्रशिक्षण साझेदारों को जोड़ा गया। इस दो वर्षों के दौरान सरकार के विभिन्न मंत्रालयों को समन्वित करके पचास से अधिक कार्यक्रम संचालित किये गए साथ ही सभी मंत्रालयों में एक किस्म की सक्रियता देखी जा रही है।
इसी योजना का असर है कि देश में पहली बार राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क का संचालन (एनएसक्यूएफ)-कौशल प्रशिक्षण के परिणामों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क को तैयार किया गया।  दिसंबर 2016 तक सभी सरकारी कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों को राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क  से जोड़ दिया जाएगा।
इस योजना के अन्तर्गत आईटीआई को पुनर्जीवित किया, 1,141 नए आटीआई बनाए गए जिनमें 1.73 लाख सीटें हैं और केंद्रीय प्रशिक्षण संस्थानों के महानिदेशालय ने 15,000 अनुदेशकों को प्रशिक्षित किया है। सभी राज्यों में स्थित सभी आईटीआई संस्थानों में आईएसओ 29990:2010 प्रमाणन की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। 
पहले आईटीआई प्रशिक्षित छात्रों को बारहवी उत्तीर्ण नहीं माना जाता था।  किन्तु अब औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों में दो वर्षीय डिप्लोमा कोर्स शुरू किया गया है जिसे 12वीं कक्षा के बराबर माना जाएगा। इसके फलस्वरूप इन कार्यक्रमों की ओर युवा छात्रों का रुझान बढा है।  
इस कार्यक्रम के अधीन दूरस्थ शिक्षा का ढांचा तैयार किया गया और 18000 से अधिक प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित किया गया । सरकारी आईटीआई संस्थानों के प्रधानाचार्यों में क्षमता निर्माण को लेकर विभिन्न प्रकार प्रशिक्षण दिए गए इंजीनियरिंग कॉलेजों और पॉलिटेक्निक संस्थानों की शत-प्रतिशत उपयोगिता के लिए उनके साथ साझेदारी की गई है।
उद्यमिता- उद्यमिता के तहत शिक्षकों द्वारा बड़े पैमाने पर ओपेन ऑनलाइन कोर्स (एमओओसी) के जरिये 2200 कॉलेजों, 300 स्कूलों, 500 सरकारी आईटीआई संस्थानों, 50 व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों को उद्यमिता, शिक्षा एवं प्रशिक्षण मुहैया कराया गया।
नवंबर 2014 में नए मंत्रालय के गठन के साथ ही इसने अपने पहले साल में स्वतः ही एमएसडीई ने गतिशील कौशल पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत कर ली और भारत के कौशल प्रशिक्षण पारिस्थितिकी तंत्र को पुन: जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। आम आदमी को इन योजनाओं को लाभ मिले इसके लिए एमएसडीई ने अपनी निगरानी तंत्र को मजबूत किया है और लगातार इनकी निगरानी कर रहा है ताकि योजनाएं कागज़ी न रहकर जमीनी स्तर तक पहुचे और जनता को लाभन्वित करें।  


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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

सामान नागरिक संहिता और तीन तलाक मुद्दे का घालमेल - सर्वोच्च न्यायलय पर नज़र



पिछले कुछ दिनों से देश के सभी हलको में समान नागरिक संहिता और तीन तलाक के मुद्दे गरम हैं।  वास्तव में इधर कुछ दिनों  में इन दोनों मुद्दों पर एक साथ इतनी तरह की चर्चाएं हुई है कि ये दोनों विषयों का घालमेल हो गया है  यह घालमेल भारी भ्रम पैदा कर रहा है।  
समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड का तात्पर्य विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेना और संपत्ति के बंटवारे जैसे मुद्दों पर देश के सभी नागरिको के लिए एक समान नियम।  इसका यह मतलब है कि देश में परिवार के बीच आपसी सम्बन्ध और अधिकारों में सभी जातियों, धर्मों में समानता और किसी वर्ग विशेष को कोई छूट या रियायत का प्रावधान नहीं।  देश में संविधान के लागू होने के 65 वर्ष बाद भी अभी समाज में धर्म, संप्रदाय और संस्कृति के नाम पर अलग अलग सामाजिक परंपराएं मानने की छूट है।  उदहारण के तौर पर कुछ समुदाय में बच्चा लेने पर रोक है जबकि कुछ संप्रदाय में एक से अधिक शादी करने की छूट है, कुछ समुदायों में विवाहित महिलाओं को पिता की संपत्ति में हिस्सा न देने का नियम है।  यदि देश में समान नागरिक संहिता लागू हो जाती है तो किसी विशेष वर्ग के लिए लागू होने वाले नियम अवैध हो जायेंगे।  परंपरा के नाम पर हो रहे भेदभाव पर रोक लग जाएगी।  जबकि खानपान , वेशभूषा आदि पर स्वतंत्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।  हाँ ! धार्मिक कठमुल्लापन पर जरूर रोक लग जाएगी।  
आइये समझते हैं  क्या है समान नागरिक संहिता? संविधान बनाते वक्त समान नागरिक संहिता पर काफी चर्चा हुई थी किन्तु तत्कालीन परिस्थितियों के मद्देनजर इसे लागू न करना ही बेहतर समझा गया।  इस कारण से इसे अनुच्छेद 44 में नीति निदेशक तत्वों की श्रेणी में जगह दी गई।  नीति निदेशक तत्व संविधान का वो अंग हैं जिनके आधार पर काम करने की सरकार से उम्मीद की जाती है।  समान नागरिक संहिता तो देश नहीं लाई जा सकी लेकिन देश में विभिन्न संगठनों के विरोध के बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू 1954 -55 में हिन्दू कोड बिल लाए।  इस बिल के आधार पर ही हिन्दू विवाह कानून और उत्तराधिकार क़ानून बने।  इस बिल के जरिये संसद ने हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों के लिए विवाह, विवाह विच्छेद एवं उत्तराधिकार जैसे बना दिए गए जबकि कई अल्पसंख्यक समुदाय जैसे  मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों को अपने-अपने धार्मिक कानून यानी पर्सनल लॉ के आधार पर विवाह, तलाक आदि की छूट दी गई। कई आदिवासी समुदायों को भी यह छूट हासिल है।  
अब समझते हैं कि तीन तलाक का मुद्दा क्या है?  मुस्लिम पर्सनल ला में  तीन बार तलाक बोल कर शादी तोड़ने का अधिकार पुरुषों को प्राप्त है। अभी सवोच्च न्यायलय मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों की समीक्षा कर रहा है जिनमे  तीन तलाक, मर्दों को चार शादी की इजाज़त और निकाह हलाला शामिल हैं।  निकाह हलाला में तलाक के बाद पति-पत्नी की दोबारा शादी की व्यवस्था है किन्तु  इसके  पहले एक अपमानजन्य दौर से औरत को गुज़ारना होता है यानी तलाक पा चुकी औरत को किसी और मर्द से शादी करनी होती है, शारीरिक संबंध बनाने होते हैं और इसके बाद नए पति से तलाक लेकर पहले पति से शादी की जा सकती है।  
सर्वोच्च न्यायलय क्या समीक्षा कर रहा है? सर्वोच्च  न्यायालय द्वारा इन प्रावधानों की समीक्षा का आधार यह है कि कहीं इन प्रावधानों की वजह से मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन तो नहीं हो रहा ! ज्ञात हो कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के प्रावधानों के अनुसार  हर नागरिक को बराबरी का अधिकार दिया गया है और अनुच्छेद 21 में सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त है।  सर्वोच्च न्यायलय यह  देखना चाहता है कि कहीं तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला जैसे नियम महिलाओं के गैरबराबरी और असम्मानजनक तो नहीं हैं।  प्रारम्भ में सर्वोच्च न्यायलय ने खुद इस मुद्दे पर संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की किन्तु बाद में छह मुस्लिम महिलाओं ने भी इन प्रावधानों के विरोध में याचिका दाखिल की।  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इन प्रावधानों को इस्लाम अनुकूल धार्मिक नियम बताते हुए बदलाव का विरोध कर रहा है।  
केंद्र सरकार ने 7 अक्टूबर को दाखिल हलफनामे में इन प्रावधानों को संविधान के खिलाफ बताया ह और कहा है कि  “समानता और सम्मान से जीने का अधिकार हर नागरिक को मिलना चाहिए तथा इसमें धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। ”

समान नागरिक संहिता और तीन तलाक के मुद्दे को अलग अलग देखने के बाद यदि एक साथ देखेंगे तो पाएंगे कि  जहाँ समान नागरिक संहिता में पारिवारिक कानूनों में समानता लाने की बात है वहीँ तीन तलाक मामला संक्षिप्त मुद्दा है जिसमे मुस्लिम पर्सनल लॉ के कतिपय प्रावधानों की समीक्षा की जा रही है।  यदि सर्वोच्च न्यायलय इन प्रावधानों को संविधान के  अनुकूल नहीं पाता है तो इन्हें निरस्त कर सकता है और कुछ बदलाव करने की सिफारिश कर सकता है।  
समान नागरिक संहिता अभी चर्चा के स्तर पर है और कानून के मामले पर सरकार को सिफारिश देने वाले लॉ कमीशन ने लोगों से इस मसले पर सुझाव मांगे हैं।  लोगों के सुझाव को शामिल करते हुए लॉ कमीशन अपनी रिपोर्ट सरकार को सौपेंगी जिसके आधार पर सरकार संसद में बिल पेश कर सकती है।  लेकिन जल्दी में कुछ नहीं होने जा रहा है।  
तीन तलाक के नियमों को लेकर मुस्लिम समुदाय भी बंटा हुआ है।  मुस्लिम महिलाओं का एक बड़ा तबका और प्रगतिशील मुसलमान तीन-तलाक नियम में बदलाव को ज़रूरी मानते है जबकि ज़्यादातर मुसलमान समान नागरिक संहिता के हक में नहीं  हैं।  ऐसे में तीन तलाक के मुद्दे पर विभाजन से ध्यान बंटाने के उद्देश्य से  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उलेमा समान नागरिक संहिता के मसले को प्रमुखता से उठा रहे हैं ताकि दोनों मुद्दे के घालमेल से लोगों में भ्रम की स्थिति बने।  
उल्लेखनीय है कि समान नागरिक संहिता का मामला केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है बल्कि इससे ईसाई, पारसी और आदिवासी समुदाय भी इसके दायरे में आते हैं।  यहाँ यह भी देखने की बात है कि मुसलमान को छोड़ कर अन्य समुदायों से इस विषय पर विरोध के स्वर नहीं उठ रहे।  
सरकार के लिए नागरिक कानूनों में समानता लाने का रास्ता इतना आसान नहीं है किन्तु  पर्सनल लॉ के कुछ प्रावधानों को संविधान के आधार पर परखना ज़्यादा आसान है। 
जब मुसलमान समुदाय संविधान सम्मत नियमों के स्थान पर इस्लामिक परम्पराओं को वरीयता देता है, अब सबकी नज़रे सर्वोच्च न्यायालय पर ही टिकी है।  


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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

नए उद्यमियों के लिए लाइफलाइन- मुद्रा बैंक योजना

लेख 

नए उद्यमियों के लिए लाइफलाइन- मुद्रा बैंक योजना




पिछले साल अर्थात वर्ष 2015 में 8 अप्रैल को प्रधानमंत्री मुद्रा बैंक नाम से प्रारम्भ की गई योजना नए उद्यमियों के लिए लाइफलाइन के तौर पर साबित हो रही है।  प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी की यह एक महत्वाकांक्षी योजना है जिसका लक्ष्य भारत के छोटे उद्यमियों की सहायता करना है।  यह योजना भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के विकास और समृद्धि में सहायक बनने का सबसे बड़ा माध्‍यम बन कर उभर रही है।  मुद्रा का तात्पर्य  है - माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी।  यह एक ऐसी योजना है जो अर्थव्‍यवस्‍था में छोटे उद्यमियों के योगदान पर जोर देते हुए देश में इनक्लूसिव ग्रोथ का वातावरण बनाएंगे और नई उद्यमिता को बढ़ावा देंगे।  

मुद्रा योजना ने अपने निर्धारित लक्ष्य साल भर से पहले ही प्राप्त कर लिए जो बताता है कि यह योजना जिस दृष्टि और उद्देश्य से शुरू की गई थी वह बेहद जरुरी थी।  मुद्रा बैंक योजना के तहत 28 मार्च 2016 तक 3 करोड़ 14 लाख सूक्ष्म उद्यमों के लिए लक्ष्यानुसार 1.22 लाख करोड़ रुपए की  कर्ज सहायता स्वीकृत करके 1.16 लाख करोड़ रुपए वितरित भी किए जा चुके थे।  2015-16 के केन्द्रीय बजट में इस योजना के तहत सूक्ष्म व्यवसायिक इकाइयों के विकास हेतु रिफायनेंस सुविधाएं उपलब्ध करवाने के 20,000 करोड़ रुपए के फंड तथा क्रेडिट गारंटी कोष के लिए 3,000 करोड़ रुपए के प्रावधान का ऐलान किया गया था।  लक्ष्यानुसार  5.75 करोड़ सूक्ष्म व्यावसायिक इकाइयों  में से 3.14 करोड़ इकाइयों को अर्थात 55 फीसदी इकाइयों को पहले साल में ही इस योजना के तहत वित्तीय सहायता उपलब्ध करवा दी गई है।
मुद्रा बैंक के सूक्ष्म वित्त योजना के तहत एक साल में सबसे ज्यादा कर्ज 6105 करोड़ रुपए कर्नाटक राज्य के सूक्ष्म उद्यमों को दिया गया है। कर्ज प्राप्त करने वाला दूसरा बड़ा राज्य  महाराष्ट्र है जहां 4638  करोड़ रुपए का कर्ज सूक्ष्म इकाइयों को प्राप्त हुआ। अन्य प्रमुख राज्य हैं तमिलनाडु 4483 करोड़ रुपए, उत्तर प्रदेश 3600 करोड़ रुपए, आंध्र प्रदेश 3151 करोड़ रुपए, पश्चिम बंगाल 2639 करोड़ रुपए, गुजरात 2487 करोड़ रुपए, बिहार 2332 करोड़ रुपए, मध्यप्रदेश 2236 करोड़ रुपए, और पंजाब 1695 करोड़ रुपए की कर्ज सहायता उपलब्ध कराई गई।
वर्ष 2016-17 में 5.75 करोड़ सूक्ष्म इकाइयों का ऋण सहायता उपलब्ध करवाने का लक्ष्य रखा गया है। सभी बैंकों एवं फायनेंस कम्पनियों को निर्देश दिए गए हैं कि सूक्ष्म इकाइयों के स्थल पर जाकर कर्ज सुविधा उपलब्ध करवाएं। 
मुद्रा बैंक सिडबी की इकाई के रूप में कार्य कर रहा है। मुद्रा बैंक योजना के तहत तीन तरह के कर्ज का प्रावधान है। पहला, शिशु योजना के तहत 50 हजार रुपए तक कर्ज, दूसरा, किशोर योजना के तहत 50 हजार रुपए से 5 लाख रुपए तक कर्ज तथा तीसरा, तरुण योजना के तहत 5 लाख रुपए से 10  लाख रुपए तक के कर्ज की व्यवस्था की गई है। मुद्रा बैंक पुनर्वित्त सुविधाएं उपलब्ध करवाने के साथ ही एक नियामक के रूप में भी कार्य कर रहा है। सरकार की अन्य योजनाओं के समान प्रधानमंत्री  मुद्रा बैंक योजना के तहत भी अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कारोबारियों को प्राथमिकता के आधार पर कर्ज उपलब्ध करवाया जा रहा है। कारोबारियों तक कर्ज सुविधा पहुंच का दायरा बढ़ाने के लिए डाक विभाग के विशाल नेटवर्क का उपयोग किया गया है। मुद्रा बैंक  द्वारा व्यवसायियों को दिए जानेवाले 10 लाख रुपए तक के कर्ज पर 50 फीसदी तक गारंटी दिए जाने से व्यवसायियों को बैंकों से कर्ज आसानी से मिल जाता है।

मुद्रा बैंक भारत के छोटे कारोबारियों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुआ है। मुद्रा बैंक सूक्ष्म उद्यमों का रिफायनेंस सुविधा उपलब्ध करवाने वाला संस्थान है तथा यह रिफायनेंस स्कीम भी है। इसने माइक्रो फायनेंस कम्पनियों और बैंकों को न्यूनतम ब्याजदर पर पूर्ववित्त सुविधा उपलब्ध करवाई है। 

प्रधानमंत्री मुद्रा बैंक के प्रमुख उद्देश्य छोटे और सूक्ष्म व्यवसायों को प्रभावी ढंग से छोटे कर्ज मुहैया कराने की प्रभावी प्रणाली विकसित करने के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत उपयुक्त ढांचा तैयार करना है


मुद्रा योजना के तहत छोटी से छोटी बिज़नेस इकाइयों को जोड़ने का लक्ष्य है ताकि वित्तीय लाभ जमीनी स्तर तक पहुच सके।  इन सूक्ष्म इकाइयों में स्टाल व गुमटी में कारोबार करने वाले अतिछोटे व्यवसायी, सब्जी विक्रेता, ठेले व फिरन्तु व्यवसायी, हॉकर आदि सभी शामिल हैं। इस प्रकार प्रधानमंत्री जन धन योजना के समान ही मुद्रा बैंक योजना लघु एवं अतिलघु व्यवसायियों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हुई है। यह इस योजना की सफलता का द्योतक है।


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शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

जियो - अंततः उपभोक्ता ही ठगा जाना है


संयोग कहिये कि रिलायंस सीडीएमए जब लांच हुआ हुआ था तब भी एनडीए की ही सरकार थी। अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी। आज जब जियो लांच हो रहा है तब भी एनडीए की ही सरकार है।
मोबाइल जानकारों को मालूम होगा कि भारत में दो तरह की मोबाइल टेक्नोलॉजी लांच हुई थी - एक जीएसएम और दूसरा सीडीएमए। सीडीएमए का लाइसेंस बहुत ही कम फीस पर ग्रामीण और दूरदराज़ क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क देने के लिए दिया गया था। उसे WLL यानी वायरलेस इन लोकल लूप कहा जाता था। रिलायंस ने देश के लगभग सभी टेलकम सर्किल के लिए सीडीएमए लाइसेंस हासिल किया था बहुत ही कम कीमत पर।सीडीएमए में ढेर सारी सुविधाएँ प्रतिबंधित थी जैसे रोमिंग, कॉलर आइडेंटिफिकेशन। लूप से लूप जोड़ कर एक सर्किल से दुसरे सर्किल तक रोमिंग देकर रिलायंस ने सीडीएमए से जीएसएम नेटवर्क को चुनौती दी थी फ्री इनकमिंग देकर। जबकि सीडीएमए में इनकमिंग फ्री देना लाइसेंस की शर्त थी। बाद में जीएसएम मोबाइल प्रोवाइडर्स को भी इनकमिंग मुफ्त देनी पड़ी। यह एक बेईमानी से भरा किन्तु बड़ा कदम था देश में मोबाइल डेनसिटी बढ़ाने के लिए। तब भी रिलायंस ने कुछ नया नहीं किया था बल्कि आम भाषा में कहिये तो जुगाड़ किया था। अन्य नेटवर्क प्रोवाइडर जैसे एयरटेल, वोडाफोन आदि ने शिकायत क्यों नहीं की , ये आश्चर्य का विषय था।
आज जो काम जियो कर रही है वह बीएसएनएल और एमटीएनएल पहले से कर रहे हैं सीमित रूप से। जैसे बीएसएनएल रात को निःशुल्क काल देता है किसी भी नेटवर्क पर। देश भर में रोमिंग भी फ्री दे रहा है। डाटा पर रोमिंग चार्ज नहीं लेता है। एमटीएनएल जो दिल्ली और मुम्बई में काम करती है आपस में निशुल्क कॉलिंग सेवा देती है चाहे लैंडलाइन हो या मोबाइल। सरकारी कंपनियों के पास विज्ञापन में इन्वेस्ट करने के लिए पैसा नहीं होता है। यह बीएसएनएल ने जन्म के समय से देख रहा हूँ। कुछ फंड की कमी, कुछ अफसरों की कमी तो कुछ अन्य प्रकार के दवाब।
और जियो की स्ट्रेटेजी समझिये। वह कुछ नहीं दे रहा है आपको। इधर दो तीन वर्षों से मोबाइल कंपनियों के रेवेन्यू पैटर्न में बदलाव आया है। काल से ARPU यानी एवरेज रेवेन्यू पर यूज़र बहुत कम रह गया है। VAS यानि वैल्यू एडिड सर्विसेस जैसे एसएमएस , इंफोटेनमेंट आदि आदि का मार्किट ख़त्म हो गया है। बच गया है तो डाटा। आने वाला समय केवल और केवल डाटा का है। और डाटा के पैसे ले ही रहा है जियो। हाँ मोबाइल कंपनियों के डाटा मेज़रमेंट का पैमाने में कितना खोट है यह हम सब जानते ही हैं। डाउनलोड स्पीड जितनी अधिक होगी डाटा का उपयोग उतना ही अधिक होगा। एक आम उपभोक्ता का डाटा उपयोग जियो में दुगुना तिगुना होने की सम्भावना है। अर्थात आपके जेब से वही तीन चार सौ रूपये निकलने हैं। साथ में जियो अपना हैंडसेट बेच ही रहा है।
इसलिए आने वाले समय में सभी नेटवर्क प्रोवाइडर को अपना डाटा चार्ज कम करेंगे, डाटा मेज़रमेंट में बेईमानी करेंगे। अंततः उपभोक्ता ठगा जाना है।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

"कालाहांडी सिंड्रोम"

दाना मांझी अपनी मरी हुई पत्नी को लेकर दस किलोमीटर से अधिक चल लिया। चल लिया होगा। टीवी की मरीज़ उसका वजन ही कितना रहा होगा। ३०-३५ किलो। इतना लेकर वह चल लिया होगा। ठेंठ में पैसे नहीं रहे होंगे। घर पर भी पैसे नहीं रहे होंगे। और यदि रहे भी होंगे तो वह खर्च करने की बजाय बचाना बेहतर समझा होगा। और हमें इतना संवेदित होने की जरुरत भी नहीं है। हजारो नहीं लाखो दाना मांझी हैं हमारे आसपास। हमारी नजर कहाँ जाती है।
ये वही इलाका है न कालाहांड़ी। भूख, अकाल और बेबसी की हांडी। हमने कितनी बार खबर सुनी या पढ़ी है। कब किस अखबार ने कवर किया है काला हांडी को।
कालाहांडी और अकाल का पुराना इतिहास रहा है। कहा जाता है कि जैसे दस साल में सेंसस लौटता है आदमी के सिर गिनाने वैसे ही कालाहांडी में अकाल। अंग्रेजों के ज़माने में भी अकाल पड़ता था कालाहांडी में। आज़ादी के बाद भी पड़ते रहे अकाल। क्या बदला? बदलते रहे ओडिशा के मुख्यमंत्री, बदलते रहे देश के प्रधानमंत्री लेकिन कालाहांडी में कुछ नहीं बदला।
यदि आज आप संवेदित हैं दाना मांझी को लेकर तो हमें खुद पर शर्मिंदा होने के साथ ही अपने सिस्टम पर भी शर्मिंदा होने की जरुरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देने के साथ साथ पिछले प्रधानमंत्रियों, गृहमंत्रियों, योजना आयोग के उपाध्यक्षों, ओडिशा के सभी मुख्यमंत्रियों, वहां के विधायकों और सांसदों को लानत भेजने की जरुरत है। देश को स्वतंत्र हुए सत्तर साल हुए हैं। कितने हे कलेक्टर आए होंगे, कितने ही अधिकारी आये होंगे। उन सबने क्या किया , यह भी पूछने की जरुरत है !
कालाहांडी पर लिखी कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन कालाहांडी की तस्वीर नहीं बदली। इकोनॉमिक्स के विद्यार्थियों के बीच "कालाहांडी सिंड्रोम" एक टर्मिनोलोजी है जिसका मतलब है "प्रचुरता के बावजूद भी भुखमरी". हम इसपर तो अध्यनन करते रहे लेकिन स्थिति नहीं सुधार पाए।
झारखण्ड और बिहार के कई इलाके कालाहांडी की तरह ही हैं मैं जानता हूँ जिन्हें। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिमबंगाल आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी होंगे। पूर्वोत्तर में भी होंगे और उत्तर में भी। लोग अपने जिन्दा या मुर्दा परिजनों को अस्पताल तक या अस्पताल से घर कंधे पर, बहँगी पर, खाट पर, साइकिल पर, रिक्शा पर , ठेला पर लाद कर लाते ले जाते हैं। हजारो गाँव हैं जहाँ सड़क ही नहीं है, एम्बुलेंस रहेगी भी क्या करेगी। देश में जहाँ डाक्टर नहीं हैं, अस्पताल नहीं हैं और यदि हैं भी तो काम नहीं करते, ऐसे में यदि हम लाशो के लिए एम्बुलेंस के बारे में सोचते हैं , तो निश्चित ही हमें देश के बारे में समझ नहीं है।
सुना है एक बार ओडिशा के मुख्यमंत्री इज़राइल गए थे अध्यनन के लिए कि कालाहांडी के अकाल को कैसे दूर किया जाए। कभी किसी पत्रकार भाई ने नहीं पूछा होगा कि उस अध्यनन का क्या हुआ ! खैर ! हाँ एक खबर यह है कि आज नवीन पटनायक की ओडिशा में "वर्ल्ड इन्वेस्टमेंट समिट" कर रहे हैं। इस खबर पर पानी फेर दिया दाना मांझी ने।
और सोचिये कि अकाल प्रदेश में कितने उम्मीद से "दाना" नाम रखा होगा उसके माता पिता ने।
जिस देश की जनता हिन्दू मुस्लिम के मुद्दे पर किसी से भी भेड बकरी की तरह हंका जाती हो , वहां दाना मांझी की खबर की उम्र कुछ घंटों से अधिक नहीं हो सकती।