बुधवार, 26 अप्रैल 2017

झारखण्ड एक्सप्रेस -4




वह चंद्रपुरा में चढ़ता था 
बोरियों में भरकर कोयला 
उतर जाता था गया स्टेशन आने से पहले 
वापसी में वह गया पैसेंजर से लौट आता था 
पकड़ा जाता था अक्सर 
खाता था लाठी , जाता था जेल 
था वह मैट्रिक फेल 

उसके गाँव में बना था खादान 
उसकी जमीन पर बिछी थी रेलवे की पटरियां 
और फिर पटरी पर आ गई थी उसकी ज़िंदगी 

झारखण्ड एक्सप्रेस 
कहते हैं कोयला चोरो की गाडी बन गई है 
जो है उसकी लाइफलाइन !

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

झारखण्ड एक्सप्रेस 3


इसी ट्रेन से 
स्कूल पास कर दिल्ली गई थी 
एक लड़की 
जिसके पंखो में थे 
सपनो के रंग 
उसी डिब्बे में था 
एक लड़का भी 
लिए किताबो का गट्ठर 

उनके थैले में भरा था 
पठारों की सख्ती 
मिटटी की गंध 
जंगल का हरापन 
और वे छा गए थे 
राजधानी के अलग अलग आसमान में 

बस वे लौटे नहीं दुबारा 
इस ट्रेन से 
जिसकी बोगियों में 
फ़ैली होती है 
मजदूरों की गंध ! 

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

सेल पर हैं हम



साल के पहले दिन का सेल
साल के अंतिम दिन का सेल

आज़ादी के जश्न का सेल
गणतंत्र का सेल
संविधान दिवस सेल 

मदर्स डे सेल
फादर्स डे सेल 
डॉटर्स डे सेल 
सीनियर सिटिज़न सेल

वर्ल्ड कप सेल
आईपीएल सेल
चैम्पियंस ट्राफी सेल

समर सेल
विंटर सेल 
मिड सीज़न सेल
एन्ड ऑफ सीज़न सेल

नवरात्र सेल
दिवाली सेल
 ईद सेल
क्रिसमस सेल
अक्षय तृतीया सेल
करवा चौथ सेल

हिन्दू नव वर्ष सेल 
मुस्लिम नव वर्ष सेल 
जैन नव वर्ष सेल 
पारसी नव वर्ष सेल 
बंगाली नव वर्ष सेल 
ओडिशा नव वर्ष सेल 
बौद्ध नव वर्ष सेल 
पोंगल सेल 
वैशाखी सेल 
लोहड़ी सेल 
तीज सेल 
सावन झूला सेल 

अम्वेडकर जयंती सेल 
नेहरू जयंती सेल 
गांधी जयंती सेल 


सब सेल पर हैं हम 
इन दिनों।

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

मृत्यु


जीवन का 
अंतिम उत्सव है 
मृत्यु 

पत्तियां 
पीली पड़ जाती हैं 
मरने से पहले 
और छोड़ देती हैं 
शाखें 
पत्तियों का मरना 
वृक्ष के लिए नए कोपलों का 
फूटना भी है।  


इस ब्रह्माण्ड में 
कितनी ही सृष्टियाँ 
हर पल मरती हैं 
कहाँ रुकती है 
पृथ्वी 

मृत्यु का अर्थ 
रुकना नहीं है 
उत्सव है 

मैं चुनता हूँ मृत्यु 
तुम चुनो जीवन 
सही कहा न मैंने 
जीवन का अंतिम उत्सव है 
मृत्यु 


शनिवार, 15 अप्रैल 2017

झारखण्ड एक्सप्रेस -2



आशाएं लेकर चलती है 
झारखण्ड एक्सप्रेस 
हटिया में लद लद कर 
बैठते हैं सपने 
कुछ शिक्षा के 
कुछ रोज़गार के 
कुछ सेहत के 
लौट आती हैं 
कुछ खाली हाथ 
कुछ लहूलुहान 
कुछ अभिशप्त 
जो नहीं लौटती हैं 
वे खो देती हैं 
अपनी पहचान 

झारखण्ड एक्सप्रेस 
लौटती है लेकर बोरी भर कर 
हताशा ! 

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

प्रार्थना का धर्म


धान के बीज
बो दिए हैं तालाब के किनारे किनारे
उम्मीद में कि बादल बरसेंगे
और पौध बन उगेंगे
फिर से खेतो में रोपे जाने के लिए


सुबह दोपहर शाम
दो दो घड़े की बहंगी बना
सींच रहे हैं
धान के बीज वाली क्यारियां
पुरुष, स्त्री,
जवान होते बच्चे और बच्चियां
गाते हुए गीत
उमस और पसीने के बीच
जेठ की दुपहरी में 


साथ में कर रहे हैं प्रार्थना
बादलों से/इन्द्र से /मेढ़को से
/मंदिरों में /मस्जिदों में
ग्राम देवता से/स्थान देवता से
अपनी अपनी कुल देवियों से

उनकी  प्रार्थनाओं और गीतों में 
नहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल

गुरुवार, 16 मार्च 2017

समुद्र


सूख जाएँगी 
जब सब नदियां 
समुद्र लौटेंगे 
पहाड़ों की तरफ 



लहरें दूत हैं 
लौट जाते हैं 
देकर सन्देश 



यह समुद्र ही है 
जो नहीं होता अकेला 
इसके भीतर होता है 
पानी का अथाह शोर 



समुद्र 
बूढा हो रहा है 
मर जायेगा एक दिन 
फिर से बनेगी 
सृष्टि 


सोख लेता है 
हमारे भीतर का 
सब अहं 
बैठो तो एक पल 
समुद्र के साथ 



खारापन 
ताकत है 
समुद्र का 
पसीने की