गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

झूठ

एक झीनी सी 
रेखा होती है 
सच और झूठ के बीच 

होता है एक 
झिल्लीदार पर्दा 
झूठ और सच के मध्य 

तुम चाँद सी लगती हो 
झूठ ही तो है 
झूठ ही तो है 
जब कोई कहे 
तुम में बसती है 
मेरी जान 
सब झूठ है 

वह भी तो झूठ है 
जो कहती हो तुम 
मेरे कानो में 
मेरे सपनो में 
सपने भी झूठ ही होते हैं 
फिर भी 
देखते हैं सपने हम , तुम, सब 

झूठ होती है 
सब प्रार्थना 
सब दुआएं 
यदि यह सच है कि 
ईश्वर ने रचा है यह विधान 
क्योंकि वह तो सबसे बड़ा झूठ है 

जो आज झूठ है किसी के लिए 
हो सकता है वही एकमात्र विकल्प रहा हो 
किसी के लिए 
स्थितियों परिस्थियों के अनुकूल 
झूठ सच के भेद को देता है मिटा 

जब भी तुमसे कहता हूँ मैं
इस देश का राजा भी बोलता है
झूठ,
तुम हँसकर कहती हो
'मुझे नहीं चाहिए झूठ बोलने वाला राजा"
और तुम्हारा चेहरा लाल हो उठता है
झंडे की तरह .


गुरुवार, 30 नवंबर 2017

मौजूद रहेंगी ध्वनियाँ

एक दिन कुछ ऐसा होगा
मिट जाएगी पृथ्वी
ये महल
ये अट्टालिकाएं
ये सभ्यताएं
सब मिटटी बन जाएँगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .

जब सब सागर
सूख जायेंगे
नदियाँ मिट जायेंगी
मछलियों की हड्डियां
अवशेष बचेंगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .


मनुष्य रहे न रहे
मनुष्यता उसमे रहे न रहे
रहें न रहे दिन
रहें न रहे रात
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .

हां !
ध्वनियों से फिर जन्म लेगी
कोई न कोई पृथ्वी
अन्तरिक्ष में
कहीं न कहीं  !

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

अँधेरा है जीवन


जीवन 
अँधेरा ही तो है 
अँधेरा न हो तो 
क्या है रात का अस्तित्व 
पर्वतों की गुफाओं से लेकर 
पृथ्वी के गर्भ तक 
नदियों के उद्गम से लेकर 
समुद्र की तलहटी तक 
पसरा हुआ है 
अँधेरा ही अँधेरा 

जैसे हर रात के बाद 
दिन का होना तय है 
तय है 
दिन के बाद रात भी 
उजाले के बाद अँधेरा भी 

अँधेरा न हो तो 
कहाँ पता चलता है 
उजाले का प्रतिमान 
रौशनी का अस्तित्व ही है 
अँधेरे से 

बीज को पनपने के लिए 
जरुरी है अँधेरा 
आँखों की नींद के लिए 
जरुरी है अँधेरा 
गर्भ के भीतर भी है 
गहन अन्धकार है 
हर परछाई का रंग 
होता है अँधेरा 

अँधेरा जीवन का ही 
एक नितांत अनिवार्य पहलू है 
मेरे जीवन में स्वागत है तुम्हारा 
हे अन्धकार ! 

सोमवार, 27 नवंबर 2017

भाषाई सौहार्द





प्रकृति की अनुगूंज से 
नदियों की धारा
सागर की लहरों
पक्षियों से कलरव से
निकली जो दिव्य ध्वनियाँ 
सैकड़ो वर्षों तक 
सभ्यता की कंदराओं में 
किया विश्राम 
गढ़े  शब्द 
मानव की जिह्वा से 
गुज़रते हुए पाए अर्थ 
यही बने मानव के उदगार के माध्यम
कहलाये भाषा 


समय के सागर की लहरों के साथ 
तैरते हुए शब्दों ने की 
अनंत यात्राएं 
सभ्यता के सभी कालखंडो के साथ 
ये समृद्ध हुई 
संस्कृति की अंग बनी 
मानव की उदगार बनी 
मनोभावों के सम्प्रेषण का माध्यम बनी 

जो शब्द 
संस्कृति की यात्रा के साथ नहीं चले 
शब्दकोष की शोभा बने 
और कालांतर में समाप्त हो गए 

शब्द
जिन्होंने भूगोल की सीमाओं को 
धवस्त किया 
वे विश्व की भाषाएँ बनी 
विश्व की वाणी बनी 
ज्ञान की सेतु बनी 
जिन्होंने भाषाओँ पर लगाए पहरे
भाषाएँ वहीँ समाप्त हो गई
मृतप्राय हो गई

भाषाएँ बनी कभी तलवार तो 
कभी बनी योद्धाओं की हुंकार
कभी बनी  ज्ञान का भण्डार 
कभी संप्रेषित किया संचित ज्ञान 
तो कभी किया नृपों को सावधान 

भाषाएँ जब एक हुई 
बन गई स्वतंत्रता का स्वर 
भाषाएँ जब एक हुई 
देश हुआ एक
एक हुई जन्शंक्ति
अलग अलग भाषाएँ 
हैं जैसे उंगलियाँ 
एक साथ जब आती है 
बन जाती है मुट्ठी  
बन जाती है शक्ति ! 


बुधवार, 22 नवंबर 2017

चाँद तुम मुस्कुराना पृथ्वी के होने तक

चाँद तुम मुस्कुराना
पृथ्वी के होने तक

अभी लालटेन के नीचे
पढ़ रहे हैं
झूम झूम कर बच्चे
माँ लकड़ी वाली अंगीठी में
सेंक रही है गोल रोटियां
तुम खाकर जाना
लगाने पृथ्वी का चक्कर

चाँद तुम मुस्कुराना
माँ और बच्चों के होने तक

अभी उड़ेंगे जहाज के जहाज
और बरसा जायेंगे
बम और बारूद
चुपके से अँधेरे में
धरती के किसी कोने में
जब सो रही होगी चिड़िया
अपने बच्चों के साथ
तुम रोना , जरुर रोना
रोना एक प्रतिक्रिया है प्रतिरोध का

चाँद तुम रोना 
पृथ्वी पर बम बारूद के होने तक 

मेरे पीछे
पड़े है कई हथियारबंद लोग
तरह तरह के लेकर हथियार
इन हाथियारों से टंगे हैं 
कई कई तरह के झंडे 
कुछ भूगोल के झंडे 
कुछ धर्म के झंडे 
कुछ जाति के झंडे 
वे नहीं रहने देंगे
आदमी को आदमी

चाँद तुम मत बँटना
लड़ना,  पृथ्वी पर आदमी के होने तक .

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

प्लेटफॉर्म नंबर 16


यह है 
प्लेटफर्म नंबर 16 
जहाँ से जाती हैं 
रेलगाडियां 
पूरब की तरफ 

पूरब 
जहाँ सूरज पहले तो निकलता है 
लेकिन रौशनी पहुचती है 
सबसे बाद में 

इस प्लेटफार्म से 
रेलगाड़ियों में चढ़ती है 
थके हुए सपने
टूटे बिखरे
जड़ो से उखड़े हुए
अपनी जड़ों की तलाश के जल्दी में

इस प्लेटफार्म से
रेलगाड़ियों में चढ़ती है भीड़
भीड़ जिसने तय समय में
खडी कर दी अट्टालिकाएं
जिसकी भुजाओं ने दिन रात एक कर
पूरे किये विलायती आर्डर
जिसने उठाये कूड़े
जिसने पिलाई चाय
उठाये बोझे
प्रगति के पथ पर जिनका नहीं खुदा कभी कोई नाम

इस प्लेटफार्म से
रेलगाड़ियों में चढ़ता है रोगियों का जत्था
जीर्ण-शीर्ण शरीर लिए
कुछ ठीक हुए, कुछ नई तारीख लिए
कुछ लौटाए हुए
देश के सबसे बड़े अस्पताल से
सोचते हुए ऐसा अस्पताल उसके यहाँ क्यूं नहीं है
जहाँ हैं मरीज़ अधिक , जहाँ मरते हैं लोग अधिक

इस प्लेटफार्म से
रेलगाड़ियों में में लदता है बोरियों की तरह
बेटी की शादी करने वाला पिता,
शादी करने वाली बेटी
होने वाला दूल्हा
और उनमे शामिल होने वाला बाराती-सराती
जिनके मन में गूँज रहा होता है
देवी गीत, गाली गीत , उबटन गीत

प्लेटफार्म नंबर 16
रेलवे का प्लेटफार्म भर नहीं है
आशा की किरण है
पूरब के लिए .



कुलीनता

जिस तरह
मर्यादा पुरुषोत्तम होने के लिए
राम का राजकुंवर होना जरुरी है
उसी तरह जरुरी है
बुद्ध होने के लिए
राजकुंवर होना
राज-पाट का त्याग करना

आपका ज्ञान, आपकी शिक्षा
आपकी महानता के लिए जरुरी है
आपका कुलीन होना .

 कोई केवट या कोई लाचार बूढा
कोई धोबी या कोई बीमार रुग्ण दीन मनुष्य
नहीं हो सकता राम या बुद्ध
वह उत्त्पन नहीं कर सकता करुणा
उस पर नहीं लिखी जा सकती है
कोई महागाथा