मंगलवार, 20 मार्च 2012

दालान की ढिबरी



दादाजी
आँगन नहीं आते
दालान पर होते हैं
अकेले नहीं होते (होते भी हैं )
सांझ होते ही
साथ देती  है 
एक ढिबरी 

ढिबरी के धुएं से 
दादाजी की नाक में 
समां जाती  है 
जिसे दादा 
तम्बाकू की छींक से 
निकालने की कोशिश करते हैं 
लेकिन ढिबरी के धुएं से
उनका सम्बन्ध वर्षो पुराना है 

जानते हैं दादा
उनके नहीं रहने के बाद
दालान
हो जायेगा अकेला
ढिबरी अकेले नहीं जलेगी
जलने के लिए  चाहिए 
ढिबरी को 
बाती, तेल 
एक चिंगारी 
जो नहीं मिलेगी 
उनके जाने के बाद 

ढिबरी उदास है
दादा जी से अधिक 
उसे अकेलेपन से नहीं
मिटने का भय अधिक है.

23 टिप्‍पणियां:

  1. वाह भाई वाह ,
    ढिबरी की आह
    दादा की परवाह
    जलने की चाह
    चाहत अथाह
    ओ अल्लाह-
    दिखा दे राह ||

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  2. दो दीयों के जीवन और जयोति का साम्य... एक दूसरे का प्रतिबिम्ब.. एक के बिना दूसरे का जीवन वृथा!!
    बहुत सुन्दर!!

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  3. ढिबरी और दादा
    अब दोनों नहीं बनते,
    हमारी दुनिया बदल रही है,
    पहले की बात और थी
    जब ढिबरी से भी
    जुड़ते थे रिश्ते !

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  4. ढिबरी के साथ अकेलेपन का दर्द समेटे ये पोस्ट लाजवाब है अरुण जी ।

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  5. कभी कभी इक दूजे के सहारे ही तो चलता है जीवन खास कर संध्या की वेला में ... बहुत ही भावपूर्ण रचना अरुण जी ...

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  6. ढिबरी और दादा जी, दोनों के एकान्त का सहारा है वह दलान, समय भी गवाह है। स्मृतियाँ फिर भी बनी रहेंगी।

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  7. रिश्तों की डोर बेजान चीज़ों के साथ भी..
    आज जान नहीं है रिश्तों में.. गज़ब!

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  8. जानते हैं दादा
    उनके नहीं रहने के बाद
    दालान
    हो जायेगा अकेला
    ढिबरी अकेले नहीं जलेगी
    जलने के लिए चाहिए
    ढिबरी को
    बाती, तेल
    एक चिंगारी
    जो नहीं मिलेगी
    उनके जाने के बाद ...अकेले होकर ही मुक्ति है ... चाहो न चाहो नियति कर जाती है , स्वीकार कर लो तो न दालान अकेला न ढिबरी का प्रकाश ...

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  9. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि जिनका ना होना आपके होने के मायने बदल देता है..

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  10. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  11. यही है जीवन और उसका अन्तिम सत्य्।

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  12. बेहतर रचना। बहुत कुछ कहती और बहुत कुछ सह चुकी सहती ढिबरी अब बस टिमटिमा ही रही है। वैसे भी लालटेन ने ढिबरी का बहुत ही कस बल निकाल दिया था, अब तो सीएफ़एल का ज़माना है।

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  13. प्रस्तुती मस्त |
    चर्चामंच है व्यस्त |
    आप अभ्यस्त ||

    आइये
    शुक्रवारीय चर्चा-मंच
    charchamanch.blogspot.com

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  14. ढिबरी उदास है
    दादा जी से अधिक
    उसे अकेलेपन से नहीं
    मिटने का भय अधिक है.

    ....बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...

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  15. ओह! कितना कुछ कह जाती है रचना...
    सादर...

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  16. नव संवत्सर का आरंभन सुख शांति समृद्धि का वाहक बने हार्दिक अभिनन्दन नव वर्ष की मंगल शुभकामनायें/ सुन्दर प्रेरक भाव में रचना बधाईयाँ जी /

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